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क्र.2 मंगलाचरणः

दोस्तों, प्रत्येक संस्कृति की एक विशेषता होती है। हमारी जैन संस्कृति में किसी भी शुभ आयोजन के पहले हमारे इष्ट से मंगलकामना की परंपरा है। आइये आज के इस महोत्सव की शुरूवात के पहले हम अपने ईष्ट से, एवम माँ सरस्वती से मिलकर प्रार्थना करते है..

कि हमारे हृदय में कोई शंक न हो, कोई पंक न हो, कोई द्वंद न हो, कोई दंभ न हो, हे प्रभु, हे माँ , केवल और केवल आपकी वंदना रूपी पवित्र भावना हमारे उर में हो, हमारे अधरों पर हो।
मै तो कहूँगा कि…..

दुनिया से बाजी जीतकर मशहूर हो गये
इतना मुस्कुराये कि दुख सब दूर हो गये
हम काँच के थे दुनिया ने हमको फेंक दिया था
महावीर के चरणों में आये तो कोहिनूर हो गये।

तो चलिये ऐसी ही मंगल कामना के साथ हम मंगलाचरण का यह क्रम आरंभ करते हैं ।

मैं मंगलाचरण के प्रतिभागियों को मंच पर बुलाना चाहता हॅूं कि वो आयें और मंगलाचरण का शुभारंभ करें।

प्रतिभागी
1…………………       2…………………

जोरदार तालियों के साथ इस ओजमयी मंगलाचरण की पवित्र भावना का अनुमोदन करेंगे। बहुत ही ऊर्जामई प्रस्तुति। मंगलाचरण के प्रतिभागियों को बहुत बहुत धन्यवाद।

मैं इन पंक्तियों के माध्यम से मंगलाचरण के इस पवित्र क्रम का समापन करना चाहता हॅूं कि……..

कौन कहता है कि मेरा ईश्वर प्यार नहीं करता
प्यार तो करता है, प्यार का इजहार नहीं करता
मैनें देखा है उसके दर पे माँगनें वालों को
मेरा ईश्वर कभी भी देने से इनकार नहीं करता 

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