मंच संचालन शायरी-पार्ट 3 । Anchoring Shayari-part 3

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आपके सामने प्रस्तुत है मंच संचालन शायरी पार्ट-3 आशा है कि आपको यह प्रयास पसन्द आयेगा। अगर पसंद आये तो अपनी राय और सुझाव कमेंट बॉक्स में अवश्य दर्ज करें।

मंच संचालन शायरी

ऐसा हुनर ऐसी सादगी ऐसी
रहनुमाई की कैफियत नहीं देखी
किरदार तो बहुत देखें हैं ज़माने में
पर आप जैसी शख्सियत नहीं देखी।

 नन्हा मन चाँद के लिये मचलता ज़रूर है 
सहूलियत हो तो आदमी फिसलता ज़रूर है 
सलाहियत देना लेना शगल है लोगों का 
अपने तरक्की करें तो दिल जलता ज़रूर है।

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चिरागों को तेल सुंघाकर पानी भरने लगे हैं लोग 
किस किस तरहा ज़हरखुरानी करने लगे हैं लोग 
गये वो दिन की जब हलक़ान हुकूमत थी लोगों से 
आजकल तो पानी पीकर ही मरने लगे हैं लोग।

उम्मीद की सहर हो, कोई ना दर बदर हो 
कुछ तो करम हो मौला हर आदमी का घर हो 
कोई ना रहे भूखा हर मुँह में हो निवाला 
बेखौफ जिंदगी हो सबकी गुजर बसर हो।

अभी तो सफ़र शुरू हुआ है, 
हजारों सुहानी शाम अभी बाकी हैं 
अभी तो थोड़ा गुलकन्द ही बना है, 
पूरा गुलिश्तान अभी बाकी है 
बिखेरना है मुहब्बत का मीठापन, 
अभी तो कुछ नहीँ हुआ 
हमें जन्नत बनाना है ये दोस्त, 
बहुत काम अभी बाकी है।

आओ मिल के शपथ उठायें 
एक बड़ा सा लक्ष्य बनायें 
खड़े खड़े ही अपनी जमीं पर 
मिल कर के आकाश उठायें।

अब तो ये रोज का किस्सा है किया जाये
ये ख़ुदा तू ही बता किस तरह जिया जाये।

हमने सच को सच कहना सीख लिया
जैसा हूँ हमने वैसा दिखना सीख लिया
हम समंदर की मौज हैं हो सके तो हमें ना छेड़ो
हम तूफान पाल लिए हैं हमने मचलना सीख लिया।

उकसा मत हम अपनी पर आये तो शराफ़त छोड़ देंगें
नूर तू जिस दिन भी हाथ लगा तबियत से निचोड़ देंगें
जो मग़रूर हैं बहारों पर उनको कोई जाकर कह दे
हम ज़लज़ले हैं जिस दिन आ गए सारे भरम तोड़ दें।

इन आँसुओं को रोक लो वरना हम तुम्हेँ झिंझोड़ देंगें
मेरे अंदर समंदर पलता है बह निकले तो किनारे तोड़ देंगें।

क्या अंधकार से डरना अब, आओ सूरज बन जाते हैं
धरती अम्बर के तम सारे, जिससे डर कर छट जाते हैं
इक नूर बहे रूहानी सा, रौशन यह आलम हो जाये
आओ मित्रो हम मिल करके, इक झिलमिल दीप जलाते हैं।

  

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9 Comments
    • अमित जैन 'मौलिक'

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