भगवान बाहुबली पर कविता। Bhagwaan bahubali Hindi Poem

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इस घटना से बाहुबली का हृदय विरक्त हो उठता है। अहो! मेरे बड़े भाई भरत ने यह क्या किया ? जब इन्हें मालूम है कि चक्ररत्न अपने स्वजनों का घात नहीं कर सकता, तब पुन: क्रोध के आवेश में आकर यह लोकनिंद्य कार्य कैसे कर डाला ?

बाहुबली कहते हैं-हे भाई! जिस नश्वर राज्य के लिए आपने यह साहस किया है वह आप का ही रहे, मैंने जो भी अपराध किया है उसे क्षमा करो, अब मैं जैनेश्वरी दीक्षा लेना चाहता हूँ।

भरत का हृदय पानी-पानी हो जाता है, वह पश्चात्ताप करते हुए बार-बार बाहुबली को रोकना चाहते हैं परन्तु बाहुबली अपने बड़े पुत्र महाबली को राज्य देकर वन में जाकर नग्न दिगम्बर दीक्षा लेकर एक वर्ष के उपवास का नियम लेकर एक ही जगह निश्चल खड़े हो जाते हैं।

इधर चक्रवर्ती का चक्ररत्न अयोध्या में प्रवेश करता है, भरत का साम्राज्य पद पर अभिषेक होता है। वह चक्रवर्ती इस छह खण्ड पृथ्वी के एकछत्र स्वामी बन जाते हैं। 

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इधर बाहुबली योग साधना में लीन हैं। सर्पों ने उनके चरणों के निकट वामियाँ बना ली हैं। लताएँ चरणों के आश्रय से उन्हें वेष्टित करती हुई कंधे पर जा पहुँची हैं। बासंती बेल के सफेद-सफेद पुष्प उनके ऊपर पड़ते हुए अतिशय सुन्दर दिख रहे हैं। बाहुबली के ध्यान के प्रभाव से उस वन के क्रूर हिंसक सिंह, व्याघ्र आदि अपनी क्रूरता छोड़कर हिरण, गाय, मोर, नेवला आदि के साथ-साथ घास चरते हैं और क्रीड़ा करते हैं।

सर्प भक्ति में विभोर हो नाच रहे हैं। उसी समय मयूर भी अपने पंख फैला कर नाचते हैं। सिंहनी हरिणी के बच्चे को दूध पिलाती है तो गाय शेरनी के बच्चे को दूध पिलाती है।

सभी जात विरोधी जीव आपस में परम प्रीति को प्राप्त हो गये हैं। आकाश मार्ग में विद्याधर के विमान रुक जाते हैं, तब वे नीचे आकर बाहुबली महामुनि की भक्ति करके अतिशय पुण्य कमा लेते हैं। कभी-कभी स्वर्ग में देवों के आसन कंपने लगते हैं।

इस तरह अपनी आत्मा का ध्यान करते हुए उन महामुनि को एक वर्ष पूर्ण हो चुका था, किन्तु उनके दुधर्ष तप अनुसार उनको केवलज्ञान की प्राप्ति हो जानी थी जो कि नहीं हो रही थी।

इस का कारण जानने के लिये सम्राट भरत सर्वज्ञाता भगवान ऋषभदेव जी की शरण में गये। भगवान ऋषभ देव जी ने उनकी निर्मूल शंका ‘भरत को मुझसे क्लेश हो गया’ के बारे में भरत जी को बताया।

यद्दपि जैन धर्म के कुछ पुराणों जैसे कि महापुराण आदि में स्पष्ट लिखा है कि भगवान बाहुबली को कोई शल्य नहीं थी। मात्र इतना विकल्प अवश्य था कि ‘‘भरत को मेरे द्वारा संक्लेश हो गया है, सो भरत के पूजा करते ही वह दूर हो गया।”

कुछ अन्य ग्रंथों में इस प्रकार का वर्णन भी है कि ‘आप जाइये, कहाँ जायेंगे, भरत की भूमि पर ही तो रहेंगे’ ऐसे मंत्रियों के द्वारा व्यंगपूर्ण शब्द के कहे जाने पर बाहुबली कुछ क्षुब्ध से हुए और मान कषाय को धारण करते हुए चले गये तथा दीक्षा ले ली। उस समय से लेकर उन के मन में यही शल्य लगी हुई थी कि ‘‘मैं भरत की भूमि में खड़ा हूँ’ अत: उन्हें केवलज्ञान नहीं हो रहा था।

तब भरत जी जाकर उनकी पूजा करते हैं, और उन्हें संबोधन देते हैं कि ‘प्रभु यह कैसा चिंतन है, इस धरा पर अनादि काल से ही सहस्त्रों चक्रवर्ती राजा हुए हैं जिन्होंने अपनी तात्कालिक मनः अवस्था में अपने आपको इस संसार का स्वामी समझा किन्तु आज वो सब काल कवलित हो गये और यह धरा वैसे की वैसे ही विद्यमान है, इस धरा का ना तो कोई स्वामी है और ना ही हो सकता है। समस्त धरती की अपनी एक निज सत्ता है।’

तब तत्क्षण ही बाहुबली को केवलज्ञान प्रगट हो जाता है। बाहुबली के मन में कभी-कभी यह विकल्प हो जाया करता था कि ‘‘भरत को मुझसे क्लेश हो गया है।’’ एक और प्रचलित अवधारणा है कि बाहुबली के मन में ये शल्य थी कि ‘मैं भरत की भूमि पर ही तप कर रहा हूँ और मैंने भरत से इसकी अनुमति नहीं ली है।’

बाहुबली भगवान अपने दिव्य उपदेश से असंख्य भव्य जीवों को मोक्षमार्ग में लगाते हैं अनंतर श्री ऋषभदेव के पहले ही शेष कर्मों का नाश कर अक्षय, अनंत, अविनाशी मोक्षपद को प्राप्त कर लेते हैं।

ये बाहुबली इस युग के चौबीस कामदेवों में प्रथम कामदेव हुए हैं और सर्वप्रथम ही मोक्ष गये हैं तथा इनके एक वर्ष के ध्यान की विशेषता भी अपने आप में विलक्षण ही रही है।

यही कारण है कि चक्रवर्ती भरत उनके निर्वाण गमन के बाद उन बाहुबली की सवा पाँच सौ धनुष प्रमाण पन्ने की मूर्ति बनवाते हैं। इस इतिहास को आज असंख्य वर्ष व्यतीत हो चुके हैं। 

आज से १००० वर्ष पूर्व दक्षिण प्रान्त के गंगवंशी राजा राचमल्ल के प्रधानमंत्री और सेनापति श्रावक शिरोमणि चामुण्डराय हुए हैं। कहा जाता है कि एक दिन जब उन्हें पता चला कि भगवान बाहुबली की मूर्ति के दर्शन हेतु मेरी माता ने दूध का त्याग कर रखा है, तब वे पोदनपुर के लिए प्रस्थान कर देते हैं। मार्ग में श्रवणबेलगोला में पड़ाव डालते हैं।

रात्रि में वष्माण्डिनी देवी के स्वप्न देने पर गुरुदेव आचार्य श्री नेमीचन्द्र सिद्धांत चक्रवर्ती की आज्ञा से चामुण्डराय ५७ पुट ऊँची एक विशालकाय मूर्ति का निर्माण कराते हैं। ईसवी सन् ९८१ में इस गोम्मटेश बाहुबली मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा सम्पन्न हुई है।

श्रवण वेल गोला स्थित यह मूर्ति विश्व के गिने चुने आश्चर्यों में दर्ज है। यह मूर्ति एक ही बड़े पत्थर से तराशी गयी है। इस मूर्ति की महिमा का पता इस बात से ही चलता है कि ‘इस मूर्ति पर कोई पंक्षी आदि कभी नहीं बैठते हैं।’

इस बाहुबली मूर्ति की सुन्दरता अपने आप में अपूर्व ही है। दोनों चरणों के आस-पास में साँप की वामियाँ दिखाई गई है, जिनके अग्रभाग से सर्प मुख फाड़े हुए देख रहे हैं। ऊपर चलकर लतायें बड़ी ही सुन्दरता से जाँघों से निकलकर भुजाओं से लिपट रहीं हैं।

डा. ए. एन. उपाध्याय ने अपने एक लेख में लिखा था कि चामुण्डराय का घर का नाम ‘गोम्मट’ था। उनके इस नाम के कारण ही उनके द्वारा स्थापित बाहुबली मूर्ति का गोम्मटेश्वर नाम पड़ा है अर्थात् गोम्मटेश्वर का अभिप्राय है चामुण्डराय के देवता।

प्रत्येक 12 बर्षों में इस मूर्ति का महा मस्तकाभिषेक होता है जिसमे लाखों की तादात में भक्तगण सम्मिलित हो कर पूण्य लाभ लेते हैं। पिछली बार फरवरी 2006 में भगवान बाहुबली का महा मस्तकाभिषेक का आयोजन हुआ था। ठीक 12 वर्ष बाद फरवरी 2018 में यह महाआयोजन पुनः घोषित है।

श्रवण वेल गोला कर्नाटक राज्य के हासन जिले में स्थित शहर है। मैसूर से 84km दुरी पर स्थित यह शहर भगवान बाहुबली की विशाल प्रतिमा के कारण जग विख्यात है।

(साभार-http://hi.encyclopediaofjainism.com/index.php?title=बाहुबली_भगवान)

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