गणतंत्र दिवस पर अध्यक्षीय भाषण – 26 जनवरी पर अध्यक्षीय भाषण ड्राफ्ट, republic day speech in hindi

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गणतंत्र दिवस पर अध्यक्षीय भाषणगणतंत्र दिवस के किसी आयोजन में यदि आप कार्यक्रम अध्यक्ष या मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हैं तो आपकी चिंता एक बेहतर भाषण देने की हो सकती है। कार्यक्रम में अध्यक्षीय उद्बोधन या मुख्य अतिथि का भाषण अपेक्षित होता ही होता है। आज के इस लेख गणतंत्र दिवस पर अध्यक्षीय भाषण में अध्यक्षीय भाषण का ड्राफ्ट प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह एक सरल और सहज भाषण शैली का नमूना है जो कि तथ्यों की उलझन से परे एक बातचीत की शैली का संबोधन है जो श्रोताओं से सीधा तादात्म्य स्थापित करेगा। मुख्य अतिथि या अध्यक्ष के अलावा यह भाषण अन्य लोग भी दे सकते हैं। आशा है कि यह ड्राफ्ट आपके लिये सहायक सिद्ध होगा।

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गणतंत्र दिवस पर अध्यक्षीय भाषण

साथियों, आज हमारे देश का 69वां गणतंत्र दिवस है। गणतंत्र दिवस के इस पुनीत अवसर पर मंच पर विराजित सभी विभूतियों को, संस्थान…………के पदाधिकारियों एवम आयोजकों को, एवम आप सभी देशवासियों को जयहिंद कहता हूँ। दोस्तों, वतनपरस्ती एक ऐसा विषय है जिसे अलग अलग कवियों और शायरों ने अपनी अपनी ज़ुबान में बयां किया है। किसी ने मेहबूब वतन कहा, किसी ने वतन को सनम कहा, किसी ने प्यारा हिंदुस्तान कहा तो किसी ने जान हिंदुस्तान कहा। कोई भारत महान कह गया तो कोई भारत माता।

यहाँ संबोधन अलग हो सकता है, नज़रिया भी अलग हो सकता है लेकिन जज़्बा एक ही है, और वो जज़्बा है अपनी मिट्टी, अपनी जन्मभूमि, अपनी कर्मभूमि से बेइंतहा मोहब्बत-बेइंतहा प्यार।

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हममें से अधिकांशतः लोगों ने इस देश के लिये जंग नही लड़ी, कुर्बानी नहीं दी। ठीक बात है, लड़ भी नहीं सकते थे क्योंकि हमारे समय की बात भी नहीं थी लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि हम अपने वतन को प्यार नहीं करते, वतन की ख़ातिर जान नहीं दे सकते। अगर ऐसा वक़्त आया तो हम सब भी वतन की ख़ातिर अपना सर्वस्व न्यौछावर करने से पीछे नहीं हटेंगें। क्योंकि हमें बचपन से संस्कार में ही यह बात घुट्टी में पिलाई जाती है कि ‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।’

कोई नहीं चाहता कि कोई बाहरी आदमी हमारे घर मे घुसकर हम पर अपना हुक्म चलाये। लेकिन इसके लिये हमें मज़बूत और ज्यादा मजबूत होना पड़ेगा। अगर हम सक्षम हो जाते हैं तो ताकतवर भी हो जाते हैं। ताकत इस बात के लिये चाहिये कि कोई हमें आँख ना दिखा सके। हमारे घर में घुसकर कोई हम पर ज़ुल्म ढाये इस बात की पुनरावृत्ति से बचने के लिये हमें अपने कर्तव्यों का निर्वहन करना पड़ेगा।

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हमारे कर्तव्य क्या हैं, हम ख़ूब मेहनत करें, ख़ूब तरक्की करें। हम अगर तरक्की करते हैं तो देश भी तरक्की करता है क्योंकि जैसे हम देश से हैं, वैसे ही देश हमसे है। हम ही देश हैं। एक देश जब अनुशासित होकर तरक्की करता है तो दुनिया उसका लोहा मानती है। हम अच्छे नागरिक बनें, देश की संपदा को नुकसान ना पहुंचाये, देशहित में काम करें यही हमारे कर्तव्य हैं, यही हमारी देशभक्ति है। फिर नौबत ही नहीं आनी वाली कि किसी को देश की आन बान शान की ख़ातिर अपना लहू बहाना पड़े।

ख्यातिनाम कवि श्रीकृष्ण सरल जी कितना बढ़िया लिखते हैं कि..

साँसें गिनने को आगे भी
साँसों का उपयोग करो कुछ 
काम आ सके जो समाज के 
तुम ऐसा उद्योग करो कुछ
क्या उसको सरिता कह सकते
जिसमें बहती धार नहीं है ?
जीने का अधिकार नहीं हैं
जिसे देश से प्यार नहीं हैं
जीने का अधिकार नहीं हैं।

अपनी मातृभूमि, अपना गाँव, अपने शहर, अपने देश के लिये कुछ बड़ा कर दिखाने का ख़्वाब देखें। कुछ अलग कुछ रचनात्मक योगदान देने का प्रयास करें। तभी वंदे मातरम कहने में आनंद आयेगा। और सही मायने तब ही हमारी मातृभूमि का वंदन होगा। मुझे कवि अमित जैन ‘मौलिक’ की पंक्तियाँ याद आ रहीं हैं कि…

चलो चढ़ें सर्वोच्च शिखर पर
चलों बड़ा कुछ कर दिखलायें
जग सारा यशगाथा गाये
चमत्कार ऐसा कर जायें
तब ही महीना मंडन होगा
तब तेरा अभिनंदन होगा
जो तेरा अभिनन्दन होगा
मातृभूमि का वंदन होगा।

इसी संदेश के साथ आपसे विदा लेता हूँ। इतना मान देने के लिये आप सबका आभारी हूँ। राष्ट्रीय महोत्सव के उपलक्ष्य में कार्यक्रम तो मैंने कई संस्थानों में होते देखें हैं लेकिन आप के संस्थान के जैसा आयोजन, देशभक्ति का ऐसा भाव, प्रस्तुतियों में तन्मयता का ऐसा चाव प्रायः कम ही देखने को मिलता है। बहुत बहुत साधुवाद। बहुत शुभकामनाएं। वंदे मातरम। जय हिंद

 

इस लेख गणतंत्र दिवस पर अध्यक्षीय भाषण पर आपकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी।

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