अवार्ड सेरेमनी पर एंकरिंग स्क्रिप्ट । Award ceremony anchoring script । खिलाड़ियों के अभिनंदन समारोह पर एंकरिंग स्क्रिप्ट । खिलाड़ी के सम्मान समारोह की एंकरिंग स्क्रिप्ट

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ज़िद करो और जीतो- मुझे लगता है कि आज के जश्न का अगर कोई टाइटल-कोई शीर्षक रखना हो तो इससे बेहतर नही हो सकता। ऊंचे इरादों, कठिन परिश्रम और सतत सफलता प्राप्त कर सदा जयवंत रहने वालीं, एक मिसाल प्रस्तुत करने वालीं दो विजेताओं के अभिनदंन समारोह में, मैं अंजली जेठानी आज के इस जश्न की होस्ट, आप सब स्वजनों का बहुत बहुत स्वागत करती हूँ। यथायोग्य अभिवादन करती हूँ।

 

पढ़ोगे लिखोगे बनोगे नवाब
खेलोगे कूदोगे बनोगे ख़राब।

 

आप में से ज़्यादातर लोगों ने ये मसल-ये नसीहत अवश्य सुनी होगी। कुछ नहीं तो ये अवश्य ही सुना होगा कि पुराने समय में भारतीय जनमानस की ऐसी ही मानसिकता थी। और देखते देखते ज़माना कितना बदल गया। पहले parents अपनी समझ और कायम की हुई राय के अनुसार ही अपने बच्चों को शिक्षक, डॉक्टर या इंजीनियर बनाते थे!! जी हाँ, मैं बनाते कह रही हूँ-बनते नही!

क्योंकि 70 से 80 के दशक में कैरियर को लेकर इतनी choice नही समझी जाती थी। या यूं कह लीजिए कि उस समय के पेरेंट्स कोई ज़ोखिम नही उठाते थे। सस्ता सुंदर और टिकाऊ ही हमारा मुख्य नारा था। कार लेना तो मारुति बस, स्कूटर लेना तो बजाज, मोटरसाइकिल लेना तो हीरो होंडा, सोने के जेवर लेना तो पुश्तैनी सुनार, यहाँ तक कि बिस्किट तक मे ज़ोखिम नही मतलब पारले जी ही होना।

क्यों भला!!! जहाँ तक मैं समझती हूँ, हमें सिखाया गया था कि जांचा परखा कसौटी पर खरा नीति ही बढ़िया नीति है। मतलब no risk…..!! फिर कैसी तरक्की, कैसा विकास, कैसा उत्थान। अगर खोने को तैयार नही, गिरने को तैयार नही तो नवनिर्माण कैसे हो।

कितना बढ़िया कहा मशहूर शायर अलामा इक़बाल जी ने..

 

गिरते हैं शहसवार ही मैदाने जंग में
वो तिफ्ल क्या गिरें जो घुटनो के बल चलें।

 

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कहते हैं कि वक़्त बदलता है तो ख़यालात बदलते हैं। खेल कूद के प्रति भारतीय जनमानस के नज़रिये में भी समय के साथ बदलाव आया। ध्यानचंद जी के हॉकी के जादू से शुरू हुआ यह बदलाव हमारे द्वारा क्रिकेट का वर्ल्ड कप जीते जाने के बाद स्पष्ट दिखने लगा। लोगों के नज़रिये में सकारात्मक बदलाव आया। सचिन तेंदुलकर, सानिया मिर्जा, विश्वनाथन आनंद जैसे विश्वस्तरीय खिलाड़ियों से लोगों ने प्रेरणा ली। उन्हें आदर्श माना और फिर तो माता पिता अपने बच्चों को कहने लगे कि बनो जो बनना हो।

तो आइये, मैं आप सबको करीब से। बहुत करीब से।।। एक बड़े निर्णय, एक कड़े निर्णय, बड़े सपने, कड़ी मेहनत और अनगिनत समझौतों की नींव पर बुनी सफलता की एक ऐसी इबारत से रूबरू कराती हूँ जिसे हम सबने अभी तक इतने निकटता से ना तो जाना होगा, न ही मेहसूस किया होगा। कड़े परिश्रम, अनुशासन और सफलता की इस यात्रा के बारे में दो पंक्तियाँ कहती हूँ कि..

 

जिनको यकीं नहीं कि आसमाँ छुआ जा सकता है
वो इनकी छलांगों को देख लें भरोसा हो जाएगा।।

 

जी हाँ। जैसा कि हम सबको पता है कि आज हम हमारे अपने ही बीच की, हमारे अपने ही परिवार की नई पीढ़ी का नेतृत्व करतीं, स्थापित मान्यताओं को तोड़ती, नित नये कीर्तिमान बनाने वालीं दो ऐसी प्रतिभाशाली लड़कियों की बात करने जा रहे हैं जिनका नाम है सिम्मी और शील ।

शहर के प्रतिष्ठित कटारिया परिवार की ये बेटियां ज़िद का ही दूसरा नाम हैं। बचपन से ही इनके पापा जी और मम्मी जी ने इनकी अद्वितीय प्रतिभाओं को परख लिया और फिर आरंभ हुई उपलब्धियां अर्जित करने की एक मुहिम।

सबसे पहले छोटी बहन की रोल मॉडल बड़ी बहन सिम्मी के बारे में बात करते हैं। बचपन से ही सिम्मी की बहुमुखी प्रतिभा सामने आने लगी। सिम्मी बैडमिंटन की बहुत ही बेहतरीन खिलाड़ी रहीं। अपने स्कूलिंग समय मे कई जिला स्तरीय प्रतिस्पर्धाओं को जीत कर सिम्मी ने कटारिया परिवार का नाम ख़ूब रौशन किया।

कुछ समय बाद सिम्मी की एक और विलक्षण प्रतिभा परिवार के सामने आई। और वो यह कि सिम्मी संगीत में गहन रुचि रखतीं थीं। फिर हुई उनकी संगीत की विधिवत शिक्षा। सिम्मी ने पूरे अनुशासित तरीके से संगीत में स्नातकोत्तर शिक्षा ली और अपने स्कूल के दिनों में ही संगीत की कई स्पर्धाओं में भाग लेकर पुरुस्कृत भी हुईं।

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