2 अक्टूबर पर कविता – गांधी जयंती पर कविता by कवि अमित मौलिक

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2 अक्टूबर पर कविता – मित्रों, प्रस्तुत है 2 अक्टूबर पर कविता । जैसा कि आप सब जानते हैं कि 2 अक्टूबर 2018 को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी की जयंती है। समूचे भारत में इस अवसर पर आयोजन करके गाँधी जी को श्रद्धांजलि अर्पित की जाती है। कहीं गोष्ठियों में चिंतन होता है, तो कहीं कविता पाठ होता है। कहीं वाद-परिवाद होता है तो कहीं निबंध आदि की प्रतियोगिता आयोजित करके गांधी जी के विचारों का प्रसार होता है। इस आर्टीकल 2 अक्टूबर पर कविता के माध्यम से मैंने गांधी जी के अमिट योगदान को सरल शब्दों में पिरोने का प्रयास किया है। यदि आप..

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2 अक्टूबर पर कविता

गर तुम ना होते बापू

उपकार कैसे भूले, यह गुलसिताँ तुम्हारा
गर तुम ना होते बापू, क्या होता फिर हमारा।

व्यापारी बन के आये, इंग्लैंड से पराये
धीरे से रूप बदला, पर हम न समझ पाये
शैतानियत के दम पर, कब्जाया मुल्क सारा
गर तुम ना होते बापू, क्या होता फिर हमारा।

तुम सत्य अहिंसा के, प्रतिमान बनके आये
भारत की अस्मिता के, सम्मान बनके आये
तेरी पुकार सुनकर, उमड़ा था देश सारा
गर तुम ना होते बापू, क्या होता फिर हमारा।

इतना सरल स्वभावी, दुनियां में कौन होगा
जिसकी सुने हिमालय, वो इतना मौन होगा
अचरज करे ज़माना, कैसे फ़िरंगी हारा
गर तुम ना होते बापू, क्या होता फिर हमारा।

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2 अक्टूबर पर कविता

हे बापू तुमको मेरा प्रणाम

शांति अहिंसा के उद्घोषक, सच्चाई की जान
हे बापू तुमको मेरा प्रणाम, हे बापू तुमको मेरा प्रणाम।
गोरों से आज़ाद कराया, तुमने हिन्दोस्तान
हे बापू तुमको मेरा प्रणाम, हे बापू तुमको मेरा प्रणाम।

भाषण दो उपदेश भी देना, पहले खुद अपनाओ
जान भी देना वचन की ख़ातिर, जो मुँह से कह जाओ
सच की लड़ो लड़ाई लेकिन, वहशी मत बन जाना
शांत चित्त से अड़े रहो तुम, मिलकर कदम बढाना
कैसे हराते हैं दुश्मन को, दे दी सीख महान
हे बापू तुमको मेरा प्रणाम, हे बापू तुमको मेरा प्रणाम।

गली-गली भय से काँपी थी, गाँव-शहर सहमे थे
अँग्रेजी ज़ल्लादों के, साँसों तक पर पहरे थे
दो सौ बर्षों तक हमने, गोरों की करी गुलामी
पर तुमने जब अलख जलायी, गोरी नस्लें काँपी
बिन हथियार लड़े हो, फिर भी हार गया शैतान।
हे बापू तुमको मेरा प्रणाम, हे बापू तुमको मेरा प्रणाम।

शांति अहिंसा के उद्घोषक, सच्चाई की जान
हे बापू तुमको मेरा प्रणाम, हे बापू तुमको मेरा प्रणाम।

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