दो बेहद शानदार ग़ज़लों की प्रस्तुति। मोहब्बत से भरी दो प्यारी ग़ज़लें। Two very sweet Ghazals

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मोहब्बत से भरी दो प्यारी ग़ज़लें – कहते हैं ज़िंदगी का सबसे मुश्किल लम्हा वो होता है जब हमें किसी के सामने अपने इश्क़ का इज़हार करना हो। ज्यादातर प्यार करने वाले यहीं अटक जाते हैं। किसी की मोहब्बत में जीवन भर ठंडी-ठंडी साँसे, दर्द भरीं आहें भरने से अच्छा होता है अपने प्यार का इज़हार कर देना। वो क्या सोचेगी, वो कया सोचेगा, सोचने वाले सोचते ही रह जाते हैं और उनकी प्यार की वसीयत किसी और के नाम लिख दी जाती है। आज के इस आर्टिकल मोहब्बत से भरी दो प्यारी ग़ज़लें के द्वारा प्यार-मोहब्बत के दो अलग-अलग रंगों की तस्वीर आप के सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ। आशा है कि मेरी ग़ज़लें आपके दबे छिपे सताये ज़ज़्बातों को हवा देंगीं-दवा देंगीं।

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मोहब्बत से भरी दो प्यारी ग़ज़लें

 ग़ज़ल-खुमारी

इश्क तेरा फिसलपट्टी, धुत्त हो दिल फिसलता है
इक ख़ुमारी सी है तारी, जर्रा जर्रा पिघलता है।

कुफ़्र होती जा रही हैं, दिन-ब-दिन आँखे हमारी
रुख से परदा हटाने का, ख़्वाब रह रह मचलता है।

सितारे सब लामबंदी, करके बैठे चौखटों पर
चाँद क्योंकर रोज तेरी, मुंडेरों पर टहलता है।

मोड़ ऊँगली थाम लेते, साथ चलतीं तंग गलिंयाँ
मुहब्बत का कारवां सा, तेरे घर से निकलता है।

मोम सी तासीर मेरी, तपिश है तू सिगड़ियों की
मौत के पहलु में ही, मौलिक मेरा दिल बहलता है।

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ग़ज़ल-गुनाह

हमने तुम्हें पसंद किया, क्या गुनाह किया
थोड़ा हुजूर तंग किया, क्या गुनाह किया।

निस्बत ना थी किसी से, बदनाम बहुत था
ईमान को बुलंद किया, क्या गुनाह किया।

फाखिर था बदगुमान था, फरयाद क्या करूँ
अच्छा हुआ पतंग किया, क्या गुनाह किया।

कैसे कहूँ कि क्या मिली, तेरी नवाजिशें
आलिम था दर्दमंद किया, क्या गुनाह किया।

खुर्शीद मानकर जिया, माँगी थी एक रोज़
घर से निकलना बंद किया, क्या गुनाह किया।

**निस्बत-किसी से ना बनना मेलजोल ना होना
फाखिर-घमंडी, बदगुमान-गलतफ़हमी में रहना
आलिम-बड़ा ही होशियार, खुर्शीद-सूरज
जिया-रोशनी

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