चुनावी शायरी – इलेक्शन शायरी, चुनाव प्रचार के लिए शायरी

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चुनावी शायरी – उड़ती बात के सभी सुधि पाठकों को अमित ‘मौलिक’ का सादर नमस्कार। मुझे कई पाठकों के संदेश मिले कि मैं कुछ ऐसी चुनावी शायरी लिखूँ जिसमें चुनाव में खड़े प्रत्याशी को अपने व्यक्तित्व के बारे में कुछ कहने और बताने का अवसर मिले। आजकल सोशल मीडिया के दौर में प्रचार के उद्देश्य से कविता या शायरी में व्यक्तिगत संदेश भेजने से निश्चित रूप से मतदाता के ऊपर मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ता है। इस आर्टिकल चुनावी शायरी में अलग-अलग व्यक्तित्व के प्रत्याशियों के लिए मैंने लिखने की कोशिश की है।कुछ मुक्तकों और शायरियों में खाली स्थान छोड़ा है, जहाँ आप प्रत्याशी का नाम जोड़ सकते हैं। इस आर्टिकल, केवल इस आर्टिकल में प्रस्तुत शायरियों का उपयोग चुनावी प्रचार के लिए आप उड़ती बात की बिना कोई अनुमति लिए कर सकते हैं। किंतु किसी डिजिटल पत्रिका, किसी भी तरह के व्यवसायिक या अव्यवसायिक ब्लॉग, वेबसाइट, फेसबुक पेज आदि पर बिना अनुमति के प्रकाशन करना अवैधानिक होगा। तो आइये पढ़ते हैं चुनावी शायरी

चुनावी शायरी

फ़दाली कर रहे हैं रोज निंदा, बात कुछ होगी
अकेले उड़ रहा है जो परिंदा, बात कुछ होगी
ठगी के दौर में बेईमानियों के, बीच में रह के
किसी में अब भी है ईमान ज़िंदा, बात कुछ होगी।

यदि सच के मुहाफ़िज़ हैं, तो क्यों नज़रें चुराते हैं
करें अब सामना खुलकर, वो क्यों चेहरा छिपाते हैं
है भगदड़ बेईमानों में, यूँ ……….भाई के डर से
के जैसे शेर आता है, तो गीदड़ भाग जाते हैं।

कोई झूँठों की टोली में, कोई महफ़िल में बैठा है
कोई दौलत के मद में ख़्वाब की, झिलमिल में बैठा है
वो करके पैंतरेबाज़ी, हैं ख़ुश फिर जीत जायेंगे
पता उनको नहीं ………., शहर के दिल में बैठा है।

जो बोला सत्य तो हड़कंप जैसे, मच गया देखो
जला इक दीप तो आंतक जैसे, मच गया देखो
सभी बेईमान हैं हैराँ, हुआ क्या है शहर भर को
कि ………भाई सा इक संत कैसे, जँच गया देखो।

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अभी नहीं तो कभी नहीं, ऐसा दशकों में होता है
…….. भैया जैसा नेता, कभी कभी ही होता है।

पूरा शहर एक जुट हो कर, हिम्मत उनको देना जी
सबसे सच्चे सबसे अच्छे, अपने ……. भैया जी।

ना घोड़े हैं ना गाड़ी है, ना पहरेदार दिखते हैं
शरीफ़ों के चहेते हैं, सभी के यार दिखते हैं
यहाँ पर कौन है नेता, जो …. भाई जैसा हो
हमें तो संत से सच्चे, ये उम्मीदवार दिखते हैं।

ना पैसा है ना रुतबा है, ना मेरा कोई जलवा है
मेरा संघर्ष मेरी शान, सच्चाई मुचलका है
कोई सूरज नही हूँ मैं, महज़ इक दीप हूँ यारो
जो अपने दोस्तों के नूर से, आँधी में जलता है।

पसीना ही मेरी पहचान है, श्रम का पुजारी हूँ
हूँ खेतों का श्रमिक, मिट्टी की सौंधी सी ख़ुमारी हूँ
बहुत ही धैर्य से सबके ह्रदय तक, यात्रा करके
बना ………. तभी बेईमानियों पर, आज भारी हूँ।

माना कि सौदागरों में, ज़रा भी रहम नहीं होता
पर ताक़ीद रहे नफ़रतों से, प्यार कम नहीं होता
हमारी पॉलिश उतारने को, आमादा ऐ शख्स याद रहे
झूठ की आँधी में, सच का बजन कम नहीं होता।

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