चार पँक्तियों की लव शायरी । चार पंक्तियों में मोहब्बत की शायरी । चार पँक्तियों की इश्क शायरी । चार पंक्तियों में दिल की बात

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कभी मैं होश खो बैठूँ, कभी बेहोश तुम हो लो
सदा तेरा रहा हूँ मैं, कभी तुम भी मेरी हो लो।
समंदर सा मचलता हूँ, उफनती सी नदी बन कर
कभी आगोश में आओ, कभी आगोश में ले लो।
खुशी दे जाऊँगा तुझको, तेरे हर गम को सह लूँगा
इशारे में तेरी पलकों की, कोरों से मैं बह दूँगा।
तू हाँ तो कर सितमगर, मैं तेरी हर बात मानूँगा
मैं तेरे दिल के कोने में, कहीं चुपचाप रह लूँगा।

 

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तुम्हारा दिल दुखाना मेरा, कभी मकसद नही था
मुझे तो बस करीब से, और करीब से जानना था
कि कोई पर्दा दारी हमारे, दरमियाँ रहे भी तो क्यों
तुम्हें जब सब मानना था, तुम्हें जब रब मानना था
न उन्होंने अहद देखी है न उन्होंने जुनूँ देखा है
न अश्क देखे हैं न अश्कों से बहता खूँ देखा है
अब लोग आ गये कसीदे पढ़ने मेरे नसीब के
उन्हें क्या ख़बर मुद्दतों बाद हमने सुकूँ देखा है

 

नज़र तो देख ली तुमने, नज़रिया भूल बैठे हो
अभी बरसात ही देखी, बदरिया भूल बैठे हो।
बुरा मानो भला मानो, मैं सीधी बात करता हूँ
सवालों में घिरी इतना, संवरिया भूल बैठी हो।
मुझे इतना पता तुमको, यकीं पूरा नही मुझ पर
मगर मुझको तसल्ली है, भरोसा है बड़ा तुम पर।
तुम्हारी अनसुनी आहें, मुझे मजबूर करती हैं
रहम थोड़ा करो मुझपे, तरस मैं खाऊंगा तुझ पर।
चिरागों की रवानी तुम, तुम्हारा तेल पानी मैं
कलम स्याही तुझे कह दूँ, अधूरी सी कहानी मैं।
मुझे लिख लो मुझे पढ़ लो, उजालों से तुझे भर दूँ
कि तुम श्रृंगार हो सोलह, सजीली सी जवानी मैं।
मैं बादल जेठ का दिन में, सुकूने शाम देता हूँ
उजालों में घिरे हैं जो, उन्हें आराम देता हूँ।
मुझे मालूम है तुमको, बहुत सैलाब का डर है
तू गम ना कर सफ़ीना हूँ, मैं बाहें थाम लेता हूँ।

 

तुम्हारे होंठ की शबनम, मुझे मजबूर करती है
ये दिल बेताब होता है, धड़कनें शोर करती है।
किसी दिन चूम लूंगा मैं, तुम्हारी सुर्ख लाली को
नशे में हूँ नशेमन को, नशे से चूर करती है।
ये दिल का रोग है ज़ालिम इसे तुम सह नही सकते
तुम्हें तकलीफ तो होगी मगर तुम कह नही सकते
मुझे ये इल्म है इज़हार से डर तुमको लगता है
जता देना बताये बिन भी ज़िंदा रह नही सकते।
ऊपर अंबर में गरज गरज बादल हुंकार सुनाते हैं
हों धुत्त भले ही कितने घन तूफानों से घबराते हैं
जब ज़िद्दी होकर ज़ज़्बे से जौहर रण बीच मचलता है
तब ताज हाथ मे आता है तब सिर ऊंचे हो पाते हैं।
जिससे प्रीत हुई है बैरन, दर्द-विरद वो समझे ना
मैं कहती कुछ वो समझे कुछ, ऐसौ प्रेम करे कोई ना
कान्हा तोसे हार गई मैं, निष्ठुर बन तूँ जीत गया
छल छल छलके नैन कटोरे, भीतर नीरज रीत गया।

 

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