कविता ‘नव यौवना’ । Kavita ‘Naw yovna’

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मावठे की ठिठुरन में 
ताज़ा ताज़ा जवां हुई 
एक नव यौवना 
ओस की बूँद
उमंग में लहकती 
बहकती ठिठकती 
लुढ़कती संभलती 
अपनी आश्रय दाता 
जूही की एक पत्ती
से लड़याती इठलाती
इतराती बतियाती
पूछती है-
तुम्हें चिड़चिड़ाहट नहीं होती 
ऐसा स्थिर जीवन बिताने में 
कोई घबराहट नहीं होती 
क्या तुम्हें नहीं भाते 
झरनों के किनारे 
नदी की कलकल 
कुओं की हुमक 
सागर की धमक,
क्या तुम्हारे हृदय में 
प्रेम के 
आनंद के 
श्रृंगार के, 
गीत नहीं आते 
सदा गंभीर रहने वाली 
जूही की पत्ती 
खूब खिलखिलाई 
बूँद की उच्छृंखल मनोवृत्ति 
पर खुल के मुस्कराई 
थोड़ा रुकी, 
चुप हुई, 
फिर बोली-अनिंद्य सुंदरी 
तुम्हारी बातें 
लुभावनी है 
तुम्हारी चमक-खनक 
तुम्हारी अदम्य ऊर्जा 
मनभावनी है 
लेकिन 
यह तो नियति की मंशा है 
फिर इसमें कैसी शंका है 
तुमसे अलग है 
मेरे दायित्व की भिन्नता 
फिर इसमें 
किस प्रकार की खिन्नता 
यह विवशता नहीं 
निर्वहन है 
फिर इसमें कैसा प्रश्न 
कि क्यों सहन है 
प्रकृति की दो ही 
अपरिहार्य सेवाएं हैं
एक प्राण द्रव्य है
एक प्राणवायु है
सौभाग्य से 
एक का तुम्हें 
एक का मुझे 
प्रतिनिधित्व मिला है 
तब ही तो 
इस धरती पर 
जीवन पुष्प खिला है 
जब मेरी 
नस नस तुम्हें पीती है 
तभी ये दुनिया जीती है 
शैली और स्वभाव में 
अवश्य ही अंतर है 
लेकिन उद्देश्य एक ही हैं 
कर्तव्य के प्रति निष्ठा ही 
हमारा मूल मंतर है 
तुम बहको लहको 
बरसो छलको 
इसमें नहीं कोई बुराई है 
मुझे तो समीर के मंद 
झोंकों में ही रस आ जाता है 
मुझे इतने में ही खुश रहने दो 
मेरी सुन्दर बहना 
इसी में सबकी भलाई है।

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