कविवर भूधरदास जी कृत बारह भावना। Kavivar Bhudhar das ji krit barah bhawana

                   

बारह भावना

राजा राणा छत्रपति, हाथिन के असवार ।
मरना सब को एक दिन, अपनी-अपनी बार ॥
दल बल देवी देवता, मात-पिता परिवार ।
मरती बिरिया जीव को, कोऊ न राखन हार ॥
दाम बिना निर्धन दुखी, तृष्णा वश धनवान ।
कबहूँ न सुख संसार में ,सब जग देख्यो छान ॥

 

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आप अकेला अवतरे , मरे अकेला होय ।
यो कबहूँ इस जीव को ,साथी सगा न कोय॥
जहाँ देह अपनी नहीं, तहां न अपना कोय ।
घर सम्पति पर प्रकट ये, पर हैं परिजन लोय।।
दिपै चाम-चादर मढ़ी, हाड़ पींजरा देह ।
भीतर या सम जगत में, और नहीं घिन गेह।।
मोह नींद के जोर, जगवासी घूमें सदा ।
कर्म चोर चँहु ओर, सरवस लुटैं सुध नहीँ॥
सतगुरु देय जगाय, मोहनींद जब उपशमैं ।
तब कछु बनहिं उपाय, कर्म चोर आवत रूकै॥
ज्ञान-दीप तप-तेल भर, घर शोधै भ्रम छोर।
या विधि बिन निकसै नहीं, बैठे पूरब चोर ॥
पंच महाव्रत संचरण, समिति पंच परकार ।
प्रलय पंच इंद्रय विजय, धार निर्जरा सार ॥
चौदह राजु उतंग नभ, लोक पुरूष संठान ।
तामे जीव अनादितैं, भ्रमरत है बिन ज्ञान॥
धन कन कंचन राजसुख, सबहि सुलभकर जान।
दुर्लभ है संसार में, एक जथारत ज्ञान।।
जाँचे सुर-तरू देय सुख, चिंतत चिंता रैन।
बिन जाँचे बिन चिन्तये, धर्म सकल सुख देन॥

समाधि भावना 

दिन रात मेरे स्वामी, मैं भावना ये भाऊँ।
देहान्त के समय मै, तुम को न भूल जाऊँ॥
शत्रु अगर कोई हो, सन्तुष्ट उन को कर दूँ।
समता का भाव धर कर, सब से क्षमा कराऊँ॥
त्यागूं आहार पानी, औषध विचार अवसर ।
टूटे नियम न कोई, द्रढ़ता ह्र्दय में लाऊ॥ 

 

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जागें नहीं कषायें, नहिं वेदना सतावे।
तुमसे ही लौ लगी हो, दुर्ध्यान को भगाऊँ ॥
आतम स्वरूप अथवा, आराधना विचारूं।
अरहंत सिद्ध साधू, रटना यही लगाऊँ ॥
धर्मात्मा निकट हों, चरचा धर्म सुनावे।
वह सावधान रक्खें, ग़ाफ़िल ना होने पाऊँ।।
जीने की हो ना बांछा, मरने की हो न इच्छा।
परिवार मित्र जन से, मैं राग को हटाऊँ।।
भोगे जो भोग पहले, उनका न होवे सुमरन।
मैं राज्य संपदा या, पद इंद्र का न चाहूँ।।
रत्नत्रय का पालन, हो अंत में समाधी।
शिवराम प्रार्थना है, जीवन सफल बनाऊं।।
दिन रात मेरे स्वामी, मैं भावना ये भाऊँ।
देहान्त के समय मै, तुम को न भूल जाऊँ॥

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